BY
Yoganand Shrivastava
New dehli: सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को आवारा कुत्तों और सड़क पर घूमने वाले मवेशियों के मुद्दे पर सुनवाई हुई। जस्टिस विक्रम नाथ की बेंच ने पक्षों से विस्तृत बहस सुनी और राज्यों की जिम्मेदारियों को लेकर कड़ा रुख अपनाया।
आवारा कुत्तों और सड़क दुर्घटनाएं: कोर्ट की चिंता
New dehli: सुनवाई के दौरान कोर्ट ने राजस्थान में पिछले 20 दिनों में आवारा पशुओं के कारण हुई दो गंभीर सड़क दुर्घटनाओं का जिक्र किया। इनमें से एक न्यायाधीश गंभीर रीढ़ की चोट से जूझ रहे हैं। कोर्ट ने NHAI से पूछा कि संवेदनशील मार्गों पर फेंसिंग या सुरक्षा इंतजाम क्यों नहीं किए जा रहे। एमिकस क्यूरी गौरव अग्रवाल ने बताया कि मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक और पंजाब जैसी राज्य सरकारें अब तक हलफनामा नहीं दाखिल कर सकीं और शेल्टर व नसबंदी केंद्रों में मानव संसाधन की कमी है।
कपिल सिबल और पशु प्रेमियों का पक्ष
New dehli: वरिष्ठ वकील कपिल सिबल ने कुत्तों के पक्ष में बहस करते हुए कहा कि सभी कुत्ते एक जैसे नहीं होते और उन्हें मारना हल नहीं है। उन्होंने बताया कि उन्होंने इसी वजह से मुर्गियां खाना छोड़ दिया। सिबल ने जोर देकर कहा कि नसबंदी, टीकाकरण और सुरक्षित आश्रय मॉडल अपनाने से कुत्तों की संख्या नियंत्रित की जा सकती है। कोर्ट ने पूछा कि सुबह कौन-सा कुत्ता किस मूड में है, तो सिबल ने स्पष्ट किया कि यह हर जगह सड़कों पर कुत्तों की उपस्थिति को सही नहीं ठहराता।
यातायात सुरक्षा और सोसाइटी की चिंताएं
New dehli: सुप्रीम कोर्ट में यह भी चर्चा हुई कि कुत्ते वाहन चालकों, खासकर दोपहिया वाहन चालकों के लिए खतरा हैं। ग्रुप हाउसिंग सोसायटी के प्रतिनिधियों ने कहा कि उनकी प्रॉपर्टी और बच्चों की सुरक्षा के लिए सोसाइटी को कुत्तों को हटाने का अधिकार होना चाहिए। एमिकस क्यूरी और याचिकाकर्ता वंदना जैन ने सुझाव दिया कि जन-जागरूकता अभियान, देशी कुत्तों को अपनाना, और पशु कल्याण बोर्ड द्वारा निर्धारित SOP के अनुसार कार्यवाही जरूरी है।
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