Cow Protection Politics : गौ रक्षा का शोर, गौ माता बेबस और किसान लाचार, राजधानी से लेकर प्रदेश के हर गांव तक फैला पाखंड
भोपाल नगर निगम के स्लॉटर हाउस में गौ मांस मिलने की खबर आई और शहर की राजनीति में अचानक गाय फिर से सबसे बड़ा मुद्दा बन गई। नारे लगे, हंगामा हुआ, हिंदू संगठनों का गुस्सा फूटा और पुलिस कमिश्नर कार्यालय को घंटों घेरे में रखा गया। सवाल यह नहीं है कि गौ मांस कैसे मिला, सवाल यह है कि जिसकी जिम्मेदारी थी, उसकी तरफ उंगली उठाने की बजाय सारा गुस्सा उस दरवाजे पर क्यों निकाला गया, जहां जवाबदेही सबसे कम थी।
स्लॉटर हाउस नगर निगम के अधीन है। वहां किस पशु की स्लाटिंग होगी, उसकी जांच होगी या नहीं, पूरा नियंत्रण नगर निगम के पास है। फिर भी पुलिस को कटघरे में खड़ा कर दिया गया। छह घंटे तक पुलिस कार्यालय को बंधक बनाना किसका विचार था? क्या यह आक्रोश स्वतःस्फूर्त था या किसी ने जिम्मेदारी से ध्यान भटकाने के लिए भीड़ को सही दिशा की बजाय सुविधाजनक दिशा में मोड़ दिया?
Cow Protection Politics : पुलिस पर गुस्सा, नगर निगम पर मौन
यह बड़ा दिलचस्प है कि हर बार गाय के नाम पर सबसे पहले पुलिस निशाने पर आती है। नगर निगम, जो स्लॉटर हाउस चलाता है, पशुओं की जांच करता है, परमिट देता है, उसका नाम चर्चा में आता ही नहीं। क्या इसलिए कि नगर निगम से सवाल पूछना सत्ता से सवाल पूछना हो जाएगा?
गाय के नाम पर राजनीति करने वालों को न तो स्लॉटर हाउस की प्रक्रिया से कोई लेना-देना है, न ही व्यवस्था सुधारने से। उन्हें बस एक मंच चाहिए, जहां कैमरे हों, नारे हों और किसी और की गर्दन पकड़ने का मौका मिले। पुलिस कमिश्नर कार्यालय को घेर लेना आसान है, लेकिन निगम कार्यालय के बाहर धरना देने से जवाब मिल सकता है और जवाब अक्सर असहज होते हैं।

Cow Protection Politics : सड़क पर मरती गाय, गौशालाओं पर भी चुप्पी
प्रदेश में गाय को बचाने की राजनीति इतनी ऊंची आवाज़ में होती है कि सड़क पर मरती गाय की कराह सुनाई ही नहीं देती। रोज़ ट्रक, बस और कारों के नीचे कुचली जाती गायें खबर नहीं बनतीं। गौशालाओं की हालत देखने कोई नहीं जाता, जहां कई जगह गायें भूखी, प्यासी और बीमार हालत में पड़ी हैं। कुछ गौशालाएं तो गायों के लिए श्मशान से कम नहीं रह गई हैं।
गाय को बचाने के नाम पर भाषण तो खूब हैं, लेकिन ठोस रणनीति कहीं नजर नहीं आती। सवाल यह है कि गौ माता को सच में बचाया जा रहा है या सिर्फ उसके नाम पर राजनीति की जा रही है? अगर बचाया जा रहा है, तो वह गायें कहां हैं जो सड़कों पर भटक रही हैं? उन्हें पालने-पोसने की जिम्मेदारी किसकी है?
Cow Protection Politics : 5 हजार पुरानी संस्कृति पर सकंट
इस पूरी कहानी का सबसे उपेक्षित किरदार किसान है। जिन पर गौ माता को पालने की जिम्मेदारी थी, उन्हीं के खेतों खलियानों और गोठानों से गाय का खूंटा उखड़ चुका है। किसान को अब न गाय के दूध की जरूरत है, न गोबर की। खेती ट्रैक्टर से होती है, बोनी-बखरनी मशीन से, तो बैल जोड़ी की जरूरत ही खत्म हो गई। जब जरूरत नहीं, तो पालन क्यों?
गौवंश की खरीद-बिक्री पर रोक ने किसान की कमर और तोड़ दी। गांवों की चरनोई जमीनों पर कब्जा हो गया, घास की जमीनें खत्म हो गईं। जंगल खेत बन गए, खेतों की मेढ़ें टूट गईं। अब गाय के लिए चारा कहां से आए? गेहूं का भूसा ही आखिरी सहारा है, लेकिन वह भी निकालना महंगा सौदा हो गया है। हार्वेस्टर से कटाई होती है, पराली खड़ी रह जाती है और भूसा बनवाने की लागत किसान नहीं उठा पाता।
यही वजह है कि किसान सिर्फ गाय ही नहीं, किसी भी पशु को पालने से कतराने लगा है। नतीजा यह है कि गाय या तो सड़क पर है या फिर तस्करों के ट्रक में। और एक सवाल, जिस पर कोई बोलना नहीं चाहता, जब गाय सड़क पर हैं, तो उनके नर बछड़े कहां हैं? गांवों में बैल जोड़ी दिखती क्यों नहीं? क्या वे भी इसी व्यवस्था की भेंट चढ़ रहे हैं?
गौ माता पर राजनीति करने से पहले यह तय करना जरूरी है कि हम गाय को नारे में रखना चाहते हैं या जीवन में। वरना स्लॉटर हाउस से लेकर सड़क तक, गाय सिर्फ एक खबर बनकर रह जाएगी और जिम्मेदारी हमेशा किसी और थोपी जाती रहेगी।
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