Ceasefire : क्या भारत कूटनीति में पिछड़ा ?
Ceasefire : मध्य-पूर्व में इजराइल, अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच अचानक हुए दो हफ्ते के सीजफायर ने वैश्विक राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। इस पूरे घटनाक्रम में जहां पाकिस्तान को मध्यस्थ के रूप में श्रेय दिया जा रहा है, वहीं कई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स इशारा करती हैं कि असली कूटनीतिक काम चीन ने पर्दे के पीछे रहकर किया। ऐसे में सवाल उठ रहा है—क्या भारत इस कूटनीतिक दौड़ में पीछे छूट रहा है?

Ceasefire : चीन की ‘साइलेंट डिप्लोमेसी’ बनी गेम चेंजर
रिपोर्ट्स के मुताबिक, चीन ने सीधे सामने आए बिना ईरान पर बातचीत के लिए दबाव बनाया। उसने पाकिस्तान, तुर्किये और मिस्र जैसे देशों के जरिए संवाद की राह खोली। चीन का ईरान के साथ मजबूत व्यापारिक रिश्ता है, खासकर ऊर्जा क्षेत्र में, इसलिए क्षेत्रीय स्थिरता उसके लिए बेहद जरूरी थी। चीन ने आधिकारिक रूप से अपनी भूमिका स्वीकार नहीं की, लेकिन उसके कूटनीतिक प्रयास साफ नजर आए। संयुक्त राष्ट्र में भी उसका रुख यही दिखा कि वह खुले संघर्ष के बजाय बातचीत को प्राथमिकता देता है।
Ceasefire : पाकिस्तान को मिला क्रेडिट, लेकिन भूमिका सीमित?
अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने सार्वजनिक रूप से पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ और सेना प्रमुख आसिम मुनीर का नाम लेकर सीजफायर का श्रेय दिया। इससे पाकिस्तान की वैश्विक छवि को बड़ा फायदा मिला। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान की भूमिका ज्यादा “मैसेंजर” या “फैसिलिटेटर” की थी। असली दबाव और रणनीतिक संतुलन चीन ने बनाया। इसके बावजूद पाकिस्तान ने इस मौके को कूटनीतिक जीत में बदलने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

Ceasefire : पाकिस्तान की कूटनीतिक वापसी
लंबे समय तक आतंकवाद और अस्थिरता से जुड़ी छवि झेलने वाला पाकिस्तान अब खुद को एक जिम्मेदार वैश्विक खिलाड़ी के रूप में पेश कर रहा है। अमेरिका के साथ उसके बढ़ते संबंध और मध्य-पूर्व में उसकी भौगोलिक स्थिति ने उसे इस भूमिका में मदद की। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह पाकिस्तान की हाल के वर्षों की सबसे बड़ी कूटनीतिक सफलता में से एक है। इससे उसकी “आइसोलेशन” वाली छवि टूटती दिख रही है।
Ceasefire : क्या भारत कूटनीतिक रूप से पीछे रह गया?
इस पूरे घटनाक्रम में भारत की भूमिका लगभग नदारद रही। यह स्थिति कई सवाल खड़े करती है
भारत पारंपरिक रूप से गुटनिरपेक्ष और संतुलित विदेश नीति अपनाता रहा है
लेकिन इस संकट में उसने कोई सक्रिय मध्यस्थ भूमिका नहीं निभाई
भारत का फोकस फिलहाल इंडो-पैसिफिक और घरेलू प्राथमिकताओं पर ज्यादा है
विदेश नीति विशेषज्ञों के अनुसार, भारत ने जानबूझकर “लो-प्रोफाइल” रणनीति अपनाई ताकि किसी एक पक्ष के साथ खड़ा न दिखे। लेकिन इससे उसकी वैश्विक कूटनीतिक मौजूदगी कमजोर नजर आई।
Ceasefire : भारत के लिए क्या हैं संकेत?
इस घटनाक्रम से भारत को कई अहम सबक मिलते हैं
एक्टिव डिप्लोमेसी जरूरी: सिर्फ संतुलन बनाना काफी नहीं, मौके पर सक्रिय भूमिका भी जरूरी है
मल्टी-एलायंस स्ट्रैटेजी: चीन की तरह बैकडोर कूटनीति विकसित करनी होगी
रीजनल एंगेजमेंट: मध्य-पूर्व में भारत के मजबूत संबंध हैं, उन्हें और प्रभावी बनाना होगा
इजराइल-अमेरिका-ईरान सीजफायर ने दिखा दिया कि वैश्विक राजनीति में अब सिर्फ ताकत ही नहीं, बल्कि स्मार्ट कूटनीति भी अहम है। चीन ने पर्दे के पीछे रहकर अपना प्रभाव दिखाया, जबकि पाकिस्तान ने मौके का फायदा उठाकर खुद को केंद्र में ला खड़ा किया। भारत के लिए यह एक चेतावनी भी है और अवसर भी अगर वह वैश्विक मंच पर अपनी भूमिका मजबूत करना चाहता है, तो उसे अब ज्यादा सक्रिय, रणनीतिक और आक्रामक कूटनीति अपनानी होगी।

