BY: Yoganand Shrivastva
धरती की ओर बढ़ रही एक विशाल एस्टेरॉयड चट्टान को लेकर खगोलशास्त्रियों ने चिंता जताई है। इसे वैज्ञानिकों ने ‘सिटी किलर’ का नाम दिया है, और कहा जा रहा है कि यदि यह 2032 में पृथ्वी से टकराता है, तो बड़ी तबाही मच सकती है।
कितनी गंभीर है आशंका?
वैज्ञानिकों ने इस एस्टेरॉयड का नाम 2023 DW रखा है। यह 160 मीटर चौड़ा एक अंतरिक्षीय पिंड है, जो लगभग 25 किलोमीटर प्रति सेकंड की रफ्तार से अंतरिक्ष में घूम रहा है। अभी यह धरती से करीब 1.8 करोड़ किलोमीटर दूर है, लेकिन इसकी दिशा और गति को देखते हुए इसे संभावित खतरा माना गया है।
किन इलाकों पर सबसे ज्यादा खतरा?
यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के अनुसार, सबसे अधिक टक्कर की आशंका दक्षिण प्रशांत महासागर के उस क्षेत्र में है जो न्यूजीलैंड से करीब 1,500 किलोमीटर दूर है। यदि यह समुद्र में गिरा, तो इससे भयानक सुनामी की स्थिति पैदा हो सकती है।
इसके अलावा, कुछ हिस्से हिंद महासागर और मध्य एशिया के दूरस्थ क्षेत्र भी संभावित प्रभाव क्षेत्र में आते हैं, हालांकि वहां इसकी टक्कर की संभावना कम मानी जा रही है।
धरती से टकराने पर क्या होगा?
अगर यह एस्टेरॉयड पृथ्वी की सतह से टकराता है, तो वैज्ञानिकों के अनुसार:
- लगभग 2-3 किलोमीटर चौड़ा गड्ढा बन सकता है।
- 30 किलोमीटर के क्षेत्र में सब कुछ नष्ट हो सकता है।
- अगर समुद्र में गिरा, तो 10 से 15 मीटर ऊंची सुनामी लहरें तटीय इलाकों को तबाह कर सकती हैं।
कहां और कब खोजा गया?
इस एस्टेरॉयड को फरवरी 2023 में चीन के पर्पल माउंटेन ऑब्जर्वेटरी में खोजा गया था। शुरुआत में इसे Near Earth Object (NEO) माना गया और टोरिनो स्केल पर इसका खतरा स्तर 1 था। लेकिन जैसे-जैसे और डेटा मिले, अब इसे रेटिंग 2 दी गई है – जिसका मतलब है कि उस पर नजर बनाए रखने की जरूरत है।
क्या टक्कर निश्चित है?
नासा के अनुसार, इस एस्टेरॉयड के पृथ्वी से टकराने की संभावना बेहद कम – लगभग 625 में 1 है। चांद से टकराने की संभावना इससे थोड़ी ज्यादा, 1.7% तक है। इसे IAWN (International Asteroid Warning Network) के जरिए ट्रैक किया जा रहा है।
फिलहाल घबराने की जरूरत नहीं, लेकिन सतर्कता जरूरी
हालांकि, वैज्ञानिकों ने लोगों से घबराने की अपील नहीं की है, क्योंकि 2032 तक इस एस्टेरॉयड की दिशा, गति और प्रभाव क्षेत्र में बदलाव आ सकते हैं। मगर चेतावनी यह है कि ऐसी अंतरिक्षीय घटनाएं धरती के लिए असली खतरा बन सकती हैं – इसलिए वैश्विक सतर्कता जरूरी है।





