Donkey Trade Pakistan China : सोशल मीडिया पर पाकिस्तान के कराची शहर की सड़कों पर दौड़ते गधों का वीडियो इन दिनों खूब चर्चा में है। पहली नजर में यह वीडियो भले ही लोगों को मनोरंजन वाला लगे, लेकिन इसके पीछे पाकिस्तान की एक पुरानी परंपरा और चीन से जुड़ा एक बड़ा कारोबारी कनेक्शन छिपा है।
कराची में स्वतंत्रता दिवस के मौके पर आयोजित गधा-गाड़ी दौड़ ने लोगों का ध्यान खींचा। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। पाकिस्तान अब चीन में गधों की खाल की बढ़ती मांग को देखते हुए इस जानवर से जुड़े व्यापार को भी बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।

Donkey Trade Pakistan China : कराची में क्यों लगाई गई गधों की रेस?
कराची में 16 अगस्त 2026 को स्वतंत्रता दिवस समारोह के हिस्से के तौर पर ‘आजादी डंकी-कार्ट रेस’ का आयोजन किया गया। इस प्रतियोगिता में करीब 40 गधा-गाड़ियां शामिल हुईं।
दौड़ नेट्टी जेट्टी ब्रिज से शुरू होकर कमिश्नर कार्यालय तक पहुंची। स्थानीय प्रशासन के अनुसार, यह कोई नया आयोजन नहीं है। गधा-गाड़ी दौड़ को कराची की पारंपरिक गतिविधियों और स्थानीय सांस्कृतिक विरासत से जोड़कर देखा जाता है।
पिछले वर्षों में भी स्वतंत्रता दिवस के कार्यक्रमों के दौरान कराची में इस तरह की दौड़ आयोजित की जाती रही है। यानी वायरल वीडियो के पीछे सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि शहर की पुरानी परंपरा भी है।
Donkey Trade Pakistan China : पाकिस्तान के गधों का चीन से क्या कनेक्शन है?
Donkey Trade Pakistan China की चर्चा की असली वजह चीन में गधों की खाल की मांग है। चीन में गधे की खाल से ‘एजियाओ’ नाम का उत्पाद तैयार किया जाता है।
एजियाओ पारंपरिक चीनी चिकित्सा में लंबे समय से इस्तेमाल होने वाला जिलेटिन आधारित उत्पाद है। हाल के वर्षों में इसे सौंदर्य, वेलनेस और एंटी-एजिंग से जुड़े उत्पादों में भी इस्तेमाल किया जाता है। इसके चलते गधे की खाल की मांग एक बड़े अंतरराष्ट्रीय कारोबार में बदल गई है।
Donkey Trade Pakistan China : चीन को हर साल लाखों गधों की खाल क्यों चाहिए?
चीन में एजियाओ उद्योग के लिए हर साल बड़ी संख्या में गधों की खाल की जरूरत होती है। अलग-अलग अध्ययनों में इसकी मांग का अनुमान अलग रहा है, लेकिन कई शोध इसे लगभग 40 से 50 लाख खाल प्रति वर्ष के स्तर पर बताते हैं।
यही मांग चीन के सामने सबसे बड़ी चुनौती पैदा करती है। देश में गधों की संख्या पिछले कुछ दशकों में काफी कम हुई है, जबकि एजियाओ की मांग बनी हुई है।
इसका सीधा असर अंतरराष्ट्रीय बाजार पर पड़ा। चीन की कंपनियों ने गधों की खाल के लिए दूसरे देशों की ओर रुख करना शुरू किया, जिनमें पाकिस्तान और अफ्रीकी देशों के अलावा कुछ लैटिन अमेरिकी देश भी शामिल हैं।
चीन में गधों की संख्या क्यों घट गई?
गधों की संख्या में कमी चीन की बढ़ती मांग और घटती घरेलू आपूर्ति के बीच बड़ा अंतर पैदा कर रही है।
उपलब्ध अनुमानों के अनुसार, चीन में 1990 के दशक की शुरुआत में करीब 1.1 करोड़ गधे थे। बाद के वर्षों में यह संख्या घटकर लगभग 20 लाख के आसपास रह गई।
गधों की घटती संख्या और एजियाओ की लगातार मांग ने चीन को विदेशों से खाल मंगाने पर मजबूर किया।
Donkey Trade Pakistan China : पाकिस्तान जिंदा गधे चीन नहीं भेज रहा
पाकिस्तान और चीन के बीच यह व्यापार सिर्फ जिंदा गधों को दूसरे देश भेजने तक सीमित नहीं है। पाकिस्तान में गधों को स्वीकृत बूचड़खानों में प्रोसेस करने और उनके मांस तथा खाल को निर्यात करने की व्यवस्था विकसित की जा रही है।
ग्वादर फ्री जोन इस कारोबार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। पाकिस्तान सरकार ने वहां मंजूरशुदा बूचड़खानों के जरिए गधे के मांस और खाल को प्रोसेस करके चीन भेजने की व्यवस्था की है।
2026 में ग्वादर से चीन को गधे के मांस और खाल की खेप भेजे जाने की जानकारी भी सामने आई है। इससे पता चलता है कि यह कारोबार अब सिर्फ प्रस्ताव या योजना नहीं रह गया है, बल्कि वास्तविक व्यापार का रूप ले रहा है।
Donkey Trade Pakistan China : भारत की कहानी पाकिस्तान से बिल्कुल अलग
पाकिस्तान जहां चीन की मांग को कारोबारी अवसर के रूप में देख रहा है, वहीं भारत में गधों की संख्या लगातार घटती गई है।
भारत में 2012 में करीब 3.2 लाख गधे थे। 2019 की पशुधन गणना में यह संख्या घटकर करीब 1.23 लाख रह गई। यानी सात साल के भीतर गधों की आबादी में लगभग 61 फीसदी की कमी दर्ज हुई।
अगर लंबे समय की तस्वीर देखें तो गिरावट और भी बड़ी है। 1992 में भारत में करीब 9.67 लाख गधे थे, जबकि 2019 तक यह संख्या करीब 1.2 लाख रह गई। यानी करीब 88 फीसदी की गिरावट।
Donkey Trade Pakistan China : भारत में गधा पालन को बढ़ावा देने की कोशिश
गधों की घटती संख्या के बावजूद भारत में सरकार ने इनके प्रजनन और पालन को व्यवसाय के रूप में विकसित करने की दिशा में कदम उठाए हैं।
राष्ट्रीय पशुधन मिशन के तहत गधा पालन और प्रजनन को उद्यमिता कार्यक्रमों में शामिल किया गया है। पात्र लोगों को गधा प्रजनन फार्म स्थापित करने के लिए पूंजीगत सब्सिडी का प्रावधान भी किया गया है।
कुछ योजनाओं के तहत पात्र लाभार्थियों को परियोजना लागत का 50 फीसदी तक, अधिकतम 50 लाख रुपये की पूंजीगत सहायता मिल सकती है।
Donkey Trade Pakistan China : भारत में गधों की संख्या आखिर क्यों घट रही है?
गधों की आबादी में गिरावट के पीछे कई कारण बताए जाते हैं। इनमें सबसे प्रमुख कारण तेजी से बढ़ता मशीनीकरण है।
पहले कई ग्रामीण और शहरी इलाकों में सामान ढोने के लिए गधों का इस्तेमाल किया जाता था। अब वाहन और दूसरी मशीनें इस काम की जगह ले चुकी हैं। इससे गधे पालने वालों के लिए इसका आर्थिक महत्व कम हुआ है।
बीमारियां भी गधों की संख्या पर असर डालने वाला एक कारण हैं। गैंडर्स जैसी संक्रामक बीमारी घोड़ों, गधों और अन्य इक्वाइन पशुओं को प्रभावित कर सकती है।
Donkey Trade Pakistan China : कम उपयोग ने पैदा किया यह संकट
जब गधों की मदद से होने वाले पारंपरिक काम कम हुए तो लोगों का इन्हें पालने में आर्थिक फायदा भी घट गया। इसका असर प्रजनन पर पड़ा और धीरे-धीरे इनकी संख्या कम होती चली गई।
इस स्थिति को एक चक्र की तरह समझा जा सकता है—
काम कम हुए → गधे पालना कम हुआ → प्रजनन घटा → आबादी कम हुई → गधों का उपयोग और कम हुआ।
राजस्थान और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में भी 2012 से 2019 के बीच गधों की संख्या में भारी गिरावट दर्ज की गई।
Donkey Trade Pakistan China : क्या भारत भी चीन को गधे की खाल बेचता है?
फिलहाल पाकिस्तान की तरह भारत का चीन के साथ गधे की खाल का कोई बड़ा और स्पष्ट रूप से स्थापित औपचारिक व्यापार सामने नहीं आता।
चीन की मांग बहुत बड़ी है, लेकिन भारत में गधों की घटती आबादी इस कारोबार को बड़े स्तर पर विकसित करने के रास्ते में बड़ी चुनौती है।
Donkey Trade Pakistan China : चीन की मांग भारत के लिए अवसर या खतरा?
चीन में गधे की खाल की भारी मांग भारत के लिए भविष्य में एक संभावित कारोबारी अवसर जरूर बन सकती है। लेकिन इसके लिए सबसे पहले देश में गधा पालन को संगठित तरीके से विकसित करना होगा।
इसके साथ ही पशु कल्याण और संरक्षण को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यदि केवल बाजार की मांग पूरी करने के लिए गधों की संख्या बढ़ाने या उनके व्यापार पर जोर दिया गया, तो पहले से घट रही आबादी पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
इसलिए Donkey Trade Pakistan China की कहानी सिर्फ एक वायरल गधे की रेस या चीन के कारोबार की कहानी नहीं है। यह बदलती ग्रामीण अर्थव्यवस्था, पारंपरिक पशुपालन, अंतरराष्ट्रीय मांग और पशु संरक्षण के बीच बने एक दिलचस्प संबंध को भी सामने लाती है।


