Hasya Hathauda : मैं गौ माता हूं, मुझे मेरी नहीं हम सबकी चिंता है, इसलिए मैं की जगह हम शब्द बोलूंगी तो सुनो,
हमें ये सम्मान यूँ ही नहीं मिला है।
सनातन संस्कृति में पाँच हज़ार साल की साधना है हमारी।
भारत के हर घर, हर मठ, हर कथा और हर धार्मिक अनुष्ठान में हम मौजूद रही हैं।
हमारे नाम पर जयकारे लगे और आज भी लगते हैं, हमारी पूजा हुई और आज भी होती है, हमें माँ कहा जाता है।
सनातनियों की आस्था हममे इतनी गहरी है कि हर सुबह दरवाज़े पर एक रोटी खिलाई जाती है।

Hasya Hathauda : हमें हैरानी बस इस बात की है कि जब हम माँ हैं,
तो हमें “बचाने” की इतनी ज़रूरत क्यों पड़ रही है? मां कभी मरती नहीं, मां अमर है, क्योंकि मां प्रकृति है।
आज गौ रक्षा पर भाषण देने वालों की कमी नहीं है।
सरकारें भी हमसे बहुत प्रेम करती हैं। इसी प्रेम में हमारी खरीदी-बिक्री पर रोक लगा दी गई।
ठीक ही है, माँ को खरीदा-बेचा थोड़े ही जाता है।
बस दुःख इस बात का है कि, अब हम भूखी और प्यासी हैं, सड़क पर हैं, और जिम्मेदारी कोई नहीं ले रहा है, बस जयकारे लगा रहा है। गौ माता बचाओ, गौ माता को बचाओ…
Hasya Hathauda : हमारे पहले भक्त किसान थे।
उन्होंने हम पर बड़ा उपकार किया।
पहले हमें खूँटे से बाँधते थे,
अब पूरी तरह आज़ाद कर दिया।
न खेत में ले जाने की ज़रूरत,
ना चारा डालने और पानी पिलाने की जरूरत
न दूध दुहने की मजबूरी,
न बैलों की जरूरत, उनके पास
ट्रैक्टर और मशीनें हैंं। अच्छा है, हमको कोई शिकवा शिकायत नहीं है।
जंगल काट दिए गए,
तीन फसलें उगाई जा रही हैं, और…
हम गांव और शहरों की सड़कों पर आ गए हैं, अच्छा है।
Hasya Hathauda : कुछ लोग हमें गौशाला भेज देते हैं,
असल में ये वो जगह है, जहाँ चारा नहीं, पानी नहीं,
कहीं-कहीं छत भी नहीं, खुले आसमान के नीचे गुजारा।
धूप, बारिश और भूख, तीनों का प्रसाद मिलता है।
Hasya Hathauda : ईमानदारी से कहें,
तो चौड़ी सड़कें इससे बेहतर हैं, कम से कम बैठकर जुगाली तो कर लेते हैं,
किनारे थोड़ी घास भी मिल जाती हैं, हाँ, खतरा ज़रूर है, रात में बस-ट्रक वाले
कभी उठाकर ले जाते हैं, कभी कुचल कर निकल जाते हैं, शायद उन्हें माँ दिखाई नहीं देती।
Hasya Hathauda : हम आज़ाद तो हैं, लेकिन कुछ लोग हमसे बहुत नाराज़ भी हैं। वो आधी रात ट्रक लेकर आते हैं,
हमें और हमारे बछड़ों को ढोर की तरह भरते हैं। कभी किसी मशीन पर खड़ा करते हैं,
कभी पैकेट में बंद कर कंटेनरों में भरकर
दूर-दराज़ के देशों में भेज देते हैं।
वहाँ हमें खा लिया जाता है।
तब याद आता है, इससे तो सड़क ही बेहतर थी।
घायल होते थे पर ज़िंदा तो रहते थे।
कभी-कभी हमें ट्रक से उतारकर
लंबी नदियों में तैराया जाता है।
तब कुछ लोग आते हैं, जो ट्रक रोकते हैं,
हमें छुड़ाते हैं और कई बार, इसी लड़ाई में जान भी गंवा देते हैं।
ये सब देखकर अच्छा नहीं लगता। हम किसी की मौत की वजह नहीं बनना चाहते।

तब हमें वो पुराने दिन याद आते हैं, गोठान, खेत-खलिहान, पायगा, खूंटा जहां,
गले में रस्सी होती थी, कभी-कभी डंडा भी पड़ जाता था, पर जान तो सुरक्षित रहती थी।
अब तो हम खुद भूल गए हैं, कि हम गौ माता हैं। घर में कोई बांधता नहीं,
एक रोटी खिलाकर पिंड छुड़ा लेता है। संवेदना सब जताते हैं, दयावान बनते हैं,
सबसे बड़े आस्थावान कहलाते हैं, लेकिन घर में जगह
किसी के नहीं है। किसानों के पास भी नहीं। ऐसा लगता है अब उन्हें दूध की जरूरत नहीं, गोबर भी नहीं चाहिए,
उपले भी नहीं चाहिए। हम गौ माता हैं..और भारत का हर इंसान हमारी संतान है ? लेकिन क्या आज हम माँ कहलाने की कीमत चुका रहीं हैं..?
फिर भी हम निराश नहीं हैं।
क्योंकि उम्मीद ज़िंदा है।
हमें भरोसा है, किसी दिन गोविंद-गोपाला आएँगे
गायें चराएँगे, दूध, मक्खन और घी की नदियाँ बहेंगी,
और…तब अच्छे दिन आएँगे।

