Vijay Nandan (वरिष्ठ पत्रकार और डिजिटल एडिटर)
Hasya Hathauda : भैया, पाठशाला का नाम सुनते ही दिमाग में पढ़ाई लिखाई और कक्षा के दृश्य छा जाते हैं, अपन के गांव में वो भी क्या दिन थे, स्कूल में टाट पट्टी, झोले में स्लेट पट्टी, दीदी आई मिठाई लाई, हिंदी की किताब, स्लैट पट्टी, लिखने का बर्तना, चॉक, छोटे गुरूजी, बड़े गुरुजी, काला लकड़ी का बोर्ड। मिटाने वाली कपड़े की पुटली।
स्कूल के बाहर गोली बिस्कुट की दुकान, स्कूल का टाट का पर्दा, छोटे गुरूजी का रूल, बड़े गुरूजी नशे में चूर। रटत पहाड़ा, दो एकम दो, दो दुनी चार, दो तिया छह, गिनती एक पे एक ग्यारह, एक पे दो बाहर, एक पे तीन तेरह, का के कै अं अ: मुंह में दही जमा, कबड्डी, कबड्डी, उतर गई तेरी चड्डी, भाग छछुंदर भाग, तेरी मां ने बनाई चिरोटा की साग।
Hasya Hathauda : स्कूल में शरारत, छोटे गुरुजी की डांट-फटकार, कभी-कभी डंडे से मार, कपड़े की पोटली, जिसमें मां के हाथ बनी रोटी और अचार, स्कूल के लिए अक्सर आता था बुखार, कभी पेट में दर्द, कभी दस्त, छुट्टी के लिए बहाने एक से एक मस्त, खपरैल का घर, मुंडेर पर रात में अक्सर बैठता उल्लू, रात में कुत्तों का भौंकना, बाकसियारी (जंगली बिल्ली) का रोना, बाई कहती थी आज कुछ अनहोनी होगी, बाकसयारी का रोना, डर के मारे पूरी रात खराब होना।
नीबू का अचार, बुखार में मां लाती थी उधार, खूंटी पर टंगा छाता, छरपटी में गौरैया का घोंसला, कीचड़ भरा रास्ता, नर्मदा नदी का डोला पानी, सिर पर बड़े-बड़े मटके, मां को कितनी होती थी परेशानी। पायगा में गाय को पाली (बैर की पत्ती) डालना, खूंटे पर पानी पिलाना, बछड़े को दुलार और खिलाना, गाय का दूध, दओनी (मटके) में मथनी, मां हांडी भर कर निकालती थी नोनी (मक्खन)। घर का मयी (छाछ)- मीठा दही, चूल्हे का धुआं, ज्वार की मोटी रोटी-चटनी। भिंड़ी-चौली अंगूरी टमाटर और अटरकटर की सब्जी। मां बनाती थी अपनी।
Hasya Hathauda : खेत में ज्वार के ये बड़े-बड़े भुट्टे, चिड़ियों के झुंड के झुंड, गोफन से पंखेरू उड़ाना, पेड़ की छांव, कब का गया वो जमाना, कीचड़ से घुटने-घुटने भरा गोया, मेड़ की पगडंडी, रास्ते पर बबूल बोया, कांटे घुसे तो बहुत रोया, मां का दुलार, दर्द गया हार, बाबूजी की झप्पी, 10 पैसे की 3 गोली, गुल्ली डंडा, सावन का महीना, गेड़ी पर चलना, नदी किनारे फिसलना। घाट से पानी में दूर तक पत्थर फेंकना। कराड़ से पानी में कूदना। दूर तक नर्मदा में तीरना। सांस फूलना। बाई (मां) से डांट पड़ना। बाबूजी से शिकायत मत करना। बिचले-छोटे काकाजी, काकियों का प्यार, छोटी बहन को नानो, दादाजी की दुकान, हजूर लाते थे पिंड खजूर। शिवपुर का कलाकंद।

Hasya Hathauda : रात को चिमनी का उजाला, रामायण रोज पढ़ना, चौपाई में नींद की झपकी, सुबह खेत जाना, होरिया (तोता) भगाना, घर आना, फिर स्कूल जाना, शाम को फिर खेत में होरिया भगाना, कितना ठेट था गांव का वो जमाना, बाबूजी ने कहा बेटा शहर जाना, अच्छी नौकरी करना, तेरे मामा जैसा बनना, बच्चों को पढ़ाना, तेरी मां को भी ले जाना, बहन की आंख का इलाज कराना, शहर में ढूंढा ठिकाना, बनवाया किरायानामा, वो भी क्या था जमाना, अब पलट के नहीं आना। शहर में ही बस जाना। शहर में बसा लिया अपना घराना, लेकिन बहुत याद आता है, गांव वाला जमाना, बाई (मां) बाबूजी, छोटी बहन-दीदी, दादाजी की गोली वाली पेटी, हुजूर की (माछ) तरकारी), इस जन्म में अब नहीं आएगी फिर वही जीने की बारी, अगले जन्म में यही ख्वाहिश, वो मेरा गांव, जहां फिर मिले पीपल के पेड़ की छांव। जय जवान, जय किसान !

