Sanatan Dharma crisis : सनातन परंपरा के इतिहास में 10 मार्च 2026 की तारीख एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकती है। ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से जुड़े विवाद के बीच यह संभावना जताई जा रही है कि चारों पीठों के शंकराचार्य 19 साल बाद एक मंच पर दिखाई दे सकते हैं। यह आयोजन दिल्ली में प्रस्तावित है, जहां ‘गो माता राष्ट्र माता अभियान’ के तहत गो रक्षा को लेकर एक बड़ा सम्मेलन आयोजित किया जाना है। अगर यह आयोजन सफल होता है, तो यह धार्मिक इतिहास में तीसरी बार होगा जब चारों अम्नाय पीठों के शंकराचार्य एक साथ मंच साझा करेंगे।
Sanatan Dharma crisis : शंकराचार्य परंपरा की शुरुआत कब और क्यों हुई?
शंकराचार्य परंपरा की नींव आदि शंकराचार्य (788–820 ई.) ने रखी। अद्वैत वेदांत के प्रचार-प्रसार और सनातन धर्म की एकरूप व्याख्या के उद्देश्य से उन्होंने भारत की चार दिशाओं में चार मठ स्थापित किए थे।
Sanatan Dharma crisis : भारत की चार दिशाओं में ये चार पीठ
पूर्व- गोवर्धन पीठ, गोवर्धन मठ भारत के ओडिशा राज्य के पुरी में स्थित है। यह पूर्व दिशा में स्थित है। यह अद्वैत वेदांत के सिद्धांतों का प्रचार-प्रसार करता है। इसके शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती है।
पश्चिम- शारदा पीठ, शारदा मठ सबसे प्रमुख माना गया है। यह मठ गुजरात के द्वारका में स्थित है। इसके अलावा कश्मीर के शारदा गांव में एक प्राचीन ज्ञान केंद्र है। इसके साथ ही केरल में श्री नारायण गुरु और कोलकाता रामकृष्ण मठ से संबंधित मठ है। ये विद्या की देवी सरस्वती को समर्पित मठ है और आध्यात्मिक शिक्षा व सेवा प्रदान करते हैं। शारदा मठ के शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती हैं।
उत्तर- ज्योतिष पीठ, उत्तर भारत के उत्तराखंड के चमोली जिले में ज्योतिर्मठ है। इसके वर्तमान में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती हैं।
दक्षिण- श्रृंगेरी पीठ, श्रृंगेरी मठ दक्षिण भारत के राज्य कर्नाटक के चिक्कमगलुरु जिले के तुंगा नदी के किनारे स्थित है। इसको श्रृंगेरी शारदा पीठम भी कहते हैं। इसके शंकराचार्य जगद्गुरु श्री भारततीर्थ महा स्वामी हैं। ये भी अपना अहम स्थान रखता है।
इन चारों पीठों के प्रमुख को शंकराचार्य कहा जाता है। इसका उद्देश्य था कि पूरे भारत में धर्म, दर्शन और शास्त्रों की एक साझा धारा बनी रहे।

Sanatan Dharma crisis : वर्तमान में इन पीठों में विराजमान शंकराचार्य
श्रृंगेरी पीठ – जगद्गुरु श्री भारततीर्थ महा स्वामी
ज्योतिषपीठ (बद्रीनाथ) – स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती
पुरी गोवर्धन पीठ – जगद्गुरु श्री निश्चलानंद सरस्वती
द्वारका शारदा पीठ – जगद्गुरु श्री सदानंद सरस्वती
देश में परंपरागत रूप से चार ही शंकराचार्य माने जाते हैं, हालांकि विवादों के कारण कई स्थानों पर समानांतर दावे भी सामने आते रहे हैं।
Sanatan Dharma crisis : शंकराचार्य कैसे बनते हैं?
शंकराचार्य बनना किसी चुनाव या नियुक्ति की प्रक्रिया नहीं है। यह गुरु-शिष्य परंपरा के तहत होता है। संबंधित पीठ के वर्तमान शंकराचार्य या वरिष्ठ संत मंडल द्वारा शिष्य का चयन किया जाता है, जिसमें वेद-उपनिषदों का गहन ज्ञान, ब्रह्मचर्य का पालन, सन्यास दीक्षा, परंपरा के प्रति निष्ठा जैसे गुणों को देखा जाता है। यही प्रक्रिया कई बार विवाद का कारण भी बनती है।
Sanatan Dharma crisis : शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से जुड़ा विवाद क्या है?
ज्योतिषपीठ को लेकर लंबे समय से “असली-नकली शंकराचार्य” का विवाद चलता आ रहा है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को दो पीठों का समर्थन पहले से प्राप्त है, लेकिन पुरी गोवर्धन पीठ के शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती अब तक खुलकर समर्थन नहीं देते थे। हालांकि हाल ही में माघ मेला क्षेत्र में शंकराचार्य निश्चलानंद द्वारा स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को “लाडला” कहे जाने के बाद इस विवाद के कमजोर पड़ने के संकेत मिले हैं।
Sanatan Dharma crisis : गो रक्षा आंदोलन और चारों शंकराचार्य
गो रक्षा को लेकर पुरी पीठ के शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती पहले से आंदोलनरत हैं। उन्होंने गाय की रक्षा के संकल्प में सिंहासन और छत्र तक का त्याग कर रखा है। ऐसे में गो रक्षा के मुद्दे पर चारों शंकराचार्यों का एक मंच पर आना, न केवल धार्मिक बल्कि वैचारिक एकता का भी संकेत होगा।
Sanatan Dharma crisis : पहले कब-कब हुआ चतुष्पीठ सम्मेलन?
- 1779 – श्रृंगेरी में पहला चतुष्पीठ सम्मेलन
- 19 मई 2007 – बेंगलुरु में रामसेतु मुद्दे पर सम्मेलन
- 2026 (प्रस्तावित) – दिल्ली में गो रक्षा को लेकर आयोजन

संपादकीय नजरिया: चारों पीठों की एकता पर सवालिया निशान ?
आदि शंकराचार्य ने चार पीठों की स्थापना हिंदु समाज में एकता, वैदिक अनुशासन और दार्शनिक समन्वय के लिए की थी, न कि वर्चस्व की होड़ के लिए। लेकिन आज सवाल यह है कि जब चारों शंकराचार्य और पीठों में ही एकता नहीं, तो वे समाज को दिशा कैसे देंगे और सनातन धर्म को मजबूत कैसे करेंगे?
चारों पीठों के बीच समय-समय पर उभरते विवाद केवल व्यक्ति विशेष तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह परंपरा के क्षरण का संकेत भी हैं। क्या यह विवाद वैदिक ज्ञान की व्याख्या को लेकर है? या फिर मठों की प्रतिष्ठा, प्रभाव और वर्चस्व का संघर्ष? कई बार यह भी महसूस होता है कि मठों से जुड़ी भूमि, दान और संपत्ति ने साधना को सत्ता से जोड़ दिया है।
एक और गंभीर प्रश्न यह है कि क्या इन धार्मिक संस्थानों में राजनीतिक दखल बढ़ा है? जब संतों के बयान राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनने लगें, तो आध्यात्मिक निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। सनातन धर्म की शक्ति उसकी आंतरिक एकता में रही है। यदि शंकराचार्य परंपरा ही बंटी रहेगी, तो समाज में भ्रम फैलेगा, मार्गदर्शन कमजोर पड़ेगा। अब समय है कि चारों पीठ आत्ममंथन करें और आदि शंकराचार्य के मूल उद्देश्य एकता, ज्ञान और वैराग्य की ओर लौटें। यही सनातन की सच्ची मजबूती है।
यदि दिल्ली का सम्मेलन साकार होता है, तो यह सनातन परंपरा के लिए ऐतिहासिक क्षण माना जाएगा। चारों शंकराचार्यों का एक मंच पर आना केवल एक धार्मिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि परंपरा, वैधता और एकता का संदेश होगा। इससे न सिर्फ शंकराचार्य विवाद को विराम मिल सकता है, बल्कि गो रक्षा जैसे मुद्दों पर सनातन समाज को एक दिशा भी मिल सकती है। 10 मार्च 2026 की ओर अब देश की धार्मिक दुनिया की निगाहें टिकी हैं।
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