स्थान – अंतागढ़ | रिपोर्टर – जावेद खान
अंतागढ़ ब्लॉक के आमाबेड़ा तहसील अंतर्गत आलानार पंचायत के आश्रित गांव तमोर्रा के ग्रामीणों ने वह कर दिखाया जो अक्सर शासन और प्रशासन से अपेक्षित होता है। वर्षों तक जनप्रतिनिधियों और प्रशासन से गुहार लगाने के बावजूद जब गांव को जोड़ने वाली जीवनदायिनी सड़क पर पुल की मांग अनसुनी रह गई, तो ग्रामीणों ने अपनी मेहनत और एकजुटता से खुद ही पुल का निर्माण कर एक अनोखी मिसाल पेश की है।
गांव तमोर्रा की एकमात्र सड़क, जो आलानार पंचायत से होकर गुजरती है, रोजमर्रा की ज़रूरतों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। चाहे राशन लेने जाना हो, बच्चों को स्कूल भेजना हो या बीमारों को अस्पताल ले जाना, यही एक मार्ग था जो पूरे गांव की जिंदगी को जोड़ता था। पहले सरपंच के सहयोग से ग्रामीणों ने श्रमदान कर मुरूम की कच्ची सड़क बनाई, जिससे थोड़ी राहत मिली। लेकिन बारिश में कीचड़ और जलजमाव ने फिर से मुश्किलें बढ़ा दीं।
प्रशासन ने नहीं सुनी पुकार
जब गांव के लोगों ने पुल की मांग लेकर जनप्रतिनिधियों से लेकर कलेक्टर तक गुहार लगाई, तब भी उनकी बात अनसुनी रही। कुछ ग्रामीण तो पहली बार कांकेर कलेक्ट्रेट पहुंचे, लेकिन वहां से भी उन्हें खाली हाथ लौटना पड़ा। इससे निराश ग्रामीणों ने फैसला किया – अब न आवेदन, न निवेदन, अब खुद निर्माण।
300 ग्रामीणों की एकजुटता, दो साल की मेहनत
तमोर्रा गांव के लगभग 300 ग्रामीण गोटूल में एकत्रित हुए और यह निर्णय लिया कि पुल वे खुद बनाएंगे। हर घर से सक्षमता अनुसार चंदा इकट्ठा किया गया। करीब डेढ़ से दो लाख रुपये का खर्च आया, जो पूरी तरह से ग्रामवासियों द्वारा वहन किया गया। निर्माण सामग्री – सलीया, गिट्टी, सीमेंट, रॉड – सबकुछ ग्रामीणों ने खुद जुटाया।
फिर गांववाले खुद ही मजदूर बने, खुद ही इंजीनियर, और दिन-रात मेहनत कर दो वर्षों में पुल का निर्माण पूरा किया। आज यह पुल न सिर्फ गांववालों की आवाजाही का सहारा बना हुआ है, बल्कि उनके दृढ़ संकल्प और आत्मनिर्भरता की जीवंत मिसाल बन चुका है।
मीडिया की पहली मौजूदगी – उत्साहित हुए ग्रामीण
जब ग्रामीणों को पता चला कि मीडिया उनके गांव में पहुंची है, तो वे पूरे जोश के साथ गांव के मुहाने पर उनका स्वागत करने के लिए एकत्रित हो गए। यह पहली बार था जब किसी मीडिया संस्थान ने उनके दर्द को समझा और उनकी आवाज़ बनने गांव तक आया।
संघर्ष से आत्मनिर्भरता की ओर
जहां सरकार की योजनाएं कागजों में उलझी रह जाती हैं, वहां तमोर्रा के ग्रामीणों ने हिम्मत और सामूहिक सहयोग से वह कर दिखाया जो उदाहरण बन गया है। इस पुल से ज्यादा मजबूत है गांववालों का इरादा, जो देशभर के ग्रामीण इलाकों को प्रेरणा देने वाला है।





